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BukmukMitti Ka Itra
Ages 5–15

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Mitti Ka Itra

by Dileep Chinchalka

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कहने को ये इक्कीस रचनात्मक लेखों का संग्रह है। ये लेख हैं जो कहानियों की तरह हैं या कहें कि ये कहानियाँ हैं जो लेखों की तरह हैं। ये चींटी से लेकर, एक नज़रअन्दाज़ फूल, कुत्ते के पिल्लों से लेकर पत्थरों और महान गायक कुमार गन्धर्व, मिट्टी के इत्र और माँ और राजस्थान के ऊँटों तक फैली हैं। इनमें दो बयान हैं। एक बाहरी है और उससे ठीक लगा एक बयान भीतरी है। जब दिलीपजी कुत्ते का हुलिया बताते हैं, उसका लटका या प्रेमिल चेहरा बयान करते हैं तो हमें अपना देखा कुत्ता याद आता रहता है। लेकिन इसके ठीक बाद जैसे ही वे कुत्ते के मन का बयान करते हैं तो हमें कुत्ता याद नहीं आता। अपने भीतर अपना मन याद आता है। जैसे, एक पेड़ और एक चींटी और एक ऊँट और एक पत्थर और हमारा मन एक ही हो। यह किताब बहुत मन से लिखी किताब है। यह बहुत मन से चित्रित किताब भी है। दिलीपजी की यह किताब बताती है कि हरेक की अपनी खुशबू है। इत्र तो मिट्टी का इत्र है। इस पूरी किताब में हर्फ दर हर्फ हम खुद से पूछते रहते हैं- हम किस मिट्टी के बने हैं? और क्या हमें अपनी मिट्टी की खुशबू पता है, अपना इत्र पता है?

Age
5–15
Language
Hindi
Pages
94
Publisher
Ektara Trus
Reading level
Medium

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Mitti Ka Itra by Dileep Chinchalka · Bukmuk